mbbsलेखक – डॉ संगीता झा

पूरी मेडिकल पढ़ाई में सेकेंड एम.बी.बी.एस. को मेडिकल पढ़ाई का सुनहरा काल कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यही समय रहता है जब स्टूडेंट्स एनाटाॅमी और फिजियोलाॅजी के टेन्स वातावरण के बाहर आते हैं, बल्कि पहली बार मरीजों को हाथ से छनू े का अवसर मिलता ह।ै पढ़ाई के साथ-साथ पै्रिक्टकल को भी उतनी ही अहमियत दी जाती है। क्लीनिकल पेस्टिंग में मरीजों के छाती में अपना आला (स्टेथेस्कोप) रखते ही बरसों के संजोये सपने साकार होते हुए लगते हैं। सारी सहेलियां गर्मी की छुट्टियां खत्म करके जैसे ही पहले दिन अपने हाॅस्टल के दरवाजे पहुंची तो एक बड़ा अजब और गजब नजारा देखने को मिला। उनके जूनियर बैच के लड़के पेंट शर्ट के ऊपर जाँघिया और सैंडो (बिना बाहं की) बनियान पहने फटंै म बने उनके हाॅस्टल के सामने मार्चपास्ट कर रहे थे। सभी ने काला नजरों का चश्मा भी लगाया हअु ा था। ये सनु ीति के बचै के लडक़ ांे की करामात थी। वे अपने जूि नयर लड़कों की इस तरह आखिरी रैि गगं ले रहे थ।े जूि नयर्स को भी फटैं म वाला अवतार काफी मजा दे रहा था। गल्र्स हाॅस्टल के बाहर छुट्टियों से वापस आती लड़कियों का तो हंसते-हंसते बुरा हाल हुआ जा रहा था। गार्गी, गरिमा और शीतल, सुनीति को तंग कर रहे थे कि वे एक जांघिया और सैंडो बनियान का इंतजाम कर रहे हैं, जिसे पहन सुनीति भी फैंटम परेड में डायना की तरह शामिल हो सकती है। फिर क्या था हसं ी का एक फव्वारा फटू पडा़ आरै सब लागे कल्पना करने लगे कि सनु ीति फैंटम डंेस में कैसी लगेगी। इन चारों में शीतल सबसे ज्यादा समझदार और स्टिंक्ट भी थी। उसने अपनी सहेि लयांे को डाटं भी लगाई कि तमाशा दख्े ाने से ज्यादा अच्छा है कि अपने-अपने रूप में जाकर रूम साफ करवाएं जो एक महीने से बंद पड़ा था। हाॅस्टल के अंदर घुसते ही सारी सहेलियां इस तरह एक दूसरे से लिपट गयीं मानों जन्म जन्मांतर के बाद मिली हों, सब तरफ ठहाके ही ठहाके पूरा का पूरा सुनीति का बचै लड़कियां खाली दस पर हल्ला एसे ा जसै े हजारांे का झडंु अदं र घसु गया हा।े सुनीति और गार्गी तो बस गरिमा को चिढ़ा-चिढ़ा कर मक्तकोड़ी कवाड़ी हडा गाने लगे। बेचारी गरिमा तो इस एक महीने में लगभग भूल ही गयी थी कि हाॅस्टल में ये भी सहना पड़ेगा। शीतल लगातार सुनीति और गार्गी को बार-बार डांट रही थी कि फिर तमु लागे शरूु , कछु तो शर्म करा।े सबको साढे़ नौ बजे क्लीनीकिल पाेि स्टगं के लिए जाना था। सुनीति ज्यों ही अपने रूम में घुसी, सब कुछ वैसा ही था जैसे वो छोड़ गई थी, फैला हुआ बिस्तर, धूल भरा कमरा। खिड़की खोलने पर नीला आकाश, वृक्षों की मैली पन्̀िायां और उन पर चहचहाते पक्षी सुनीति का स्वागत कर रहे थे। सुनीति को लगा वह इस हाॅस्टल का एक हिस्सा है और पूरी तरह इसमें वो खो जाना चाहती थी। अभी वो एक प्रेम करते कबूतर के जोड़े से बात ही कर रही थी कि शीतल ने जारे से आवाज लगाइर्- ‘‘वो मडै म, सपनांे से बाहर आओ क्लीनिक नहीं जाना क्या? गार्गी और गरिमा का बैच ए होने से उनकी मेडिकल पोस्टिंग थी वहीं सुनीति, शीतल, सौम्या के सी बैच होने से गाइनी में पोस्टिंग थी। छुट्टियों में सुनीति एक बार भिलाई के हाॅस्पीटल में गयी थी वहां उसे एक उसके ही मैडिकल कालॅ जे की एक सीनियर दीदी जो वहां इटं र्नि शप कर रही थी,ं ने एक एसाइटिस का पेसेन्ट दिखाया था। एसाइटिस का मतलब किन्हीं कारणों से पेट में पानी भर जाना जिसे जलोदर भी कहते हैं। जैसे ही वो गाइनी वार्ड में घुसे वहां पेट फुली बहुत सी महिलाएं पलंग पर लेटी हुई थीं। सुनीति ने रौब मारते हुए जोर से सबको सुनाते हुए कहा कि यहां तो एसाइटिस के मरीज भरे पड़े हैं। बाप रे, सारे बैच की तो हंसी मानो रुकने का नाम ही न लते ी हा।े वो सारी गभर्व ती महिलाएं थी जो दर्द से छटपटा रही थी।ं गाइनी वार्ड मंे कहां एसाइसि का पश्े ान्ट दख्े ाने को मिलता ह।ै अपनी मख्ू ार्त ा पर सनु ीति झपंे गयी आरै इस बात का जिक्र उसे छडे ़ने के लिए उसके मित्रा अकसर करते थ।े गाइनी वार्ड मंे कराहती आरै तांे आरै राते े बच्चांे ने सुनीति को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं किया। अलबन्̀ाा अपने सीनियर्स की मदद से गर्भवती महिलाओं के पेट पर आला रख सबने फीटल हार्ट साउंड (बच्चे की दिल की धड़कन) सुना ओर सुनीति को तो मां के पेट से लप-डब की आवाज़ सुन बड़ा अच्छा लगा। बैच के लड़के भी थे सो आरै तांे से सबं ंि धत इस विषय पर क्लास मंे लड़कियां थाडे ़ी झपंे रही थीं। पूरा बैच सीनियर्स के साथ लेबर रूम में गया, जहां नंगी लेटी औरतों को लेबर पेन में देख लड़कियां अपनी आंखें चुराने लगी। लड़के भी झेंप ही रहे थे। लेकिन ये सब तो भविष्य के डाॅक्टर थे और गर्भवती होना, लेबर पेन और बच्चों का मां के मूत्राद्वार के पास वाजाइना से बाहर आना जीवन की सच्चाई थी। एक घंटे बाद पूरा बैच नाॅर्मल हो गया और झेंप उनकी जिज्ञासा में बदल गयी। सभी गाइनी और आब्ॅ सटेि टक्ं स को एक सब्जक्े ट की तरह डिस्कस करने लग।े उधर गरिमा आरै गार्गी अपने मेडिसन पोस्टिंग में तरह-तरह की बीमारियों वाले पेशेंट देख रहे थे। पहली बार आला जब गरिमा के हाथ में आया दिल में एक टीस सी उठी कि जिंदगी भर अब मैं लोगों के दिल की धड़कनें सुनूंगी और मैं कार्डियोलाॅजिस्ट ही बनूंगी। वो मरीज के पास आंख बंद किए हाथ में स्टेथोस्कोप को हिला रही थी तो गार्गी ने झकझोर कर उसे उसके सपनों से निकला- ‘‘मूर्ख आंख खोल अब पेशंट की हिस्टंी लेना है।’’ पेशेंट की हिस्टंी मतलब पेशंट के मुंह से उसकी बीमारी के बारे में पूरी जानकारी। मसलन तकलीफ कब से है, रात को ज्यादा रहती है या दिन में वगैरह-वगैरह। सबसे मजेदार घटना तो तब हुई जब शीतल, सौम्या और सुनीति अपने दोस्तों से मिलने मेडिसन वार्ड आए। गार्गी गरिमा को हिस्टंी लेते देख सौम्या ने कहा चलो हम लागे पश्े ाटं की कसे शीट दख्े ाते ह।ंै वहां की लाके ल भाषा मंे मरीज अपनी कसे शीट को चिटठ् ी बाले ता था। साम्ै या ने पश्े ाटं से थाडे ी़ तीखी (जिसमंे नाम से निकली आवाज भी शामिल थी) आवाज मंे पछू ा- ‘‘तम्ु हारी चिटठ् ी कहां ह?ै ’’ पश्े ाटं  शरमाकर अपनी चम̂ी (अंडरवेयर) खींच कर बोला- ‘‘ये तो है, इसका क्या करोगे मेडम।’’ सारी मैडम्स खिसिया गयीं और सौम्या का तो शर्म से बुरा हाल था। गार्गी और गरिमा के बैच के लड़के तो जोर से ‘‘चिम̈ी कहां है’’ कहकर शोर मचाने लगे। शीतल सुनीति और सौम्या ने तो वहां से भाग लेने में ही अपनी भलाई समझी।

जिन लोगों की पोस्टिंग सर्जरी में हुई थी उनके भी कुछ ऐसे ही मजेदार, कुछ भयानक अनुभव थे | वहां एक सीनियर ने स्टूडेंट को ह्य्द्रोशील (टेस्टीज़ में पानी भर जाना) का कसे दिखाया। बचे ारा…..पश्े ाटं सारी लड़कियांे के सामने पटंे खाले कर खड़ा हो गया। लड़कियां सिर झुकाकर दूर देखती रहीं। लड़के कभी हाथ से छूकर कभी पश्े ाटं को खसं वा कर कभी टार्च से उसकी जाचं करने लग।े यहां भी आधे घटं े के बाद सब सहज हो गए और डाॅक्टरी का सब्जेक्ट समझ अपने सीनियर की बातें सुनने लगे।