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लेखक – डॉ संगीता झा

ये सुनीति के जीवन में पिछले पांच महीनों में सबसे अच्छा दिन साबित हुआ। उस दिन शीतल और गार्गी से जो दोस्ती की शुरूआत हुई वो आज तक जारी है। दोनों आज भी डाॅ. सुनीति की अभिन्न मित्रा हैं। अब शुभदा की असलियत का पता अंकिता को भी चल गया था और वो भी शुभदा से दूर होने लगी थी। अब सुनीति ने कक्षा में थोड़ी उल्टी – पुल्टी हरकते करना आरम्भ कर दिया। कछु अपने अल्हड़ आरै कुछ अपने हंसोडेपन के लिए सुनीति अपनी सहेलियों के बीच लोकप्रिय होती जा रही थी। वहीं बड़बोलेपन भारी शरीर की वजन से लड़के सुनीति से कोसों दूर रहते थे। जो भी लड़कों से दोस्ती होती उसमें सब उसे सुनीति बहन जरूर पुकारते थे। कक्षा में लड़कियां काफी सीधी थीं आरै लड़के ज्यादातर बिंदास थे । पढाई के अलावा वे मस्ती भी बहुत करते थे , मसलन सभी लड़कियों  के  उन्होंने नेम रखे  थे, जैसे आलूगुंडा, लौंग, बकरी, घोड़ी, भटारानी इत्यादि। सुनीति के उछलने कूदने को देख उसका नाम बजरगं बली रखा गया। जसै  ही सुनीति कक्षा में घुसती पुरे लड़के कोरस में चिल्लाते जय बजरंग बली। शुरू में सुनीति बड़ी खिसिया जाती थी लेकिन बाद में वह बड़ी आसानी से इसकी अभ्यस्त हो गयी।

डिसेक्सन टेबल पर भी शीतल, सौम्या सुनीति के काफी करीब हो गयी थीं। सौम्या का घर रायपुर में था और वह कार ले कर काॅलेज आती थी। उस समय यह रायपुर में काफी बड़ी बात थी। सौम्या बहुत पतली थी। शीतल सुनीति गोल-गोल थ।े जब कभी तीनांे एक साथ कक्षा मंे घसु ते फिर लडक़ े कारे स मंे चिल्लाते वन डबल एट 1⁄41881⁄2। सनु ीति रुआसं ी हो जाती तो गार्गी उसे समझाती कि अरे दख्ु ाी मत हा।े बीच में काॅनस्टिंक्शन बनाना तो नहीं भूले है। तेरी कमरिया वैसे ही मौजूदा है। इस तरह गार्गी, गरिमा, शीतल, सुनीति के काफी नजदीक आ गए थे। अब अंकिता, अदिति, गार्गी, गरिमा, शीतल और सुनीति एक साथ शाम को घूमने भी जाने लगे थे। काॅफी हाउस में वेटर से लड़ाई करते यदि आर्डर में देरी हो जाती। इधर सिक्ता की मित्राता भी डे स्काॅलर रीति और हाॅस्टल में मेहजबीन से हो गयी थी। एक दिन काॅफी हाउस का एक वेटर सुनीति के ग्रुप के साथ बदतमीजी से पेश आया। इन छः लड़कियों ने जोर-जोर से कुर्सियों पर लात मारी और हाॅस्टल में वापस आ गए। ये सभी बड़े रुआंसे हो गए थे। सिक्ता ने उन्हें बताया रेलवे स्टेशन के पास एक होटल मिलन है, जहां ।̊पर फैमिली रूम भी है और खाना भी काफी अच्छा है। अंधा क्या चाहे दो आंखे, अगले दिन ही ये छः लोग मिलन होटल के लिए निकल पड़े। वहां का माहौल देखते घिग्घी बंध गयी। सारे वेटर एक चड्डी और पुरानी बनियान पहने हएु थ।े हा,ं सिर्फ रिक्शवे ाले आरै लफनटश्ू ा लागे ही बठै कर चाय आरै समोसा खा रहे थे। लेकिन तभी गार्गी को सिक्ता की बात याद आयी और बोली- ‘‘चलो ।̊पर चलकर देखते हैं शायद इनका फैमिली रूम अच्छा हो।’’ लेकिन वहां तो एक अलग ही नजारा था। सारे वेटर्स की चड्डियां बनियान गमछे टेबल में फैले सूख रहे थे और बाथरूम का दरवाजा खुला था। वहां पेशाब की भयानक बदबू भी आ रही थी। और एक वेटर दूसरी तरफ मुंह करके पेशाब भी कर रहा था। सबके सब उल्टे महंु जल्दी-जल्दी सीढि़यांे से उतर कर हाटे ल से बाहर निकल गए। काउटं र वाले को तो समझही नहीं आया ये सारी एक साथ आयीं क्यांेआरै वापस गयी क्या।ंे अपने हाटे ल मंे इतनी अच्छी भीड़ या सभ्य घराने की लड़ि कयां उसने पहली बार दख्े ाी थी। मन तो किया कि सिक्ता को पकड़े और ऐसी खिंचाई करे, लेकिन हादसा तो उनके साथ ही हो गया था। किसी तरह बाहर खडे़चाट वाले से चाट खाईआरै वापस हाॅस्टल की ओर चल पड़े।
मार्च का महीना था और होली आने वाली थी। एनाटाॅमी के हेड और बाॅयज हाॅस्टल के वार्डन डाॅ. धुले हाॅस्टल में रुके लड़के-लड़कियों को जरूर अपने घर आने की दावत देते थे और न जाने पर काफी गुस्सा भी हो जाते थे। फस्र्ट एम.बी.बी. एस. वालों के फस्र्ट टर्मिनल एक्जाम होने वाले थे। उससे सुनीति का पूरा बैच हाॅस्टल में रुका हुआ था। सारे लोग होली के दिन धुले सर के घर गए। सभी लोग उन्हें चाचू बुलाते थे। सुनीति नहीं गयी। अगले दिन सुनीति को अपने रूम में बलु ाया आरै जारे से दहाड़ कर पछू ा- ‘‘कल तमु मरे े यहां क्यांे नहीं आयी?’’ सनु ीति ने धीरे से कहा- ‘‘तबीयत ठीक नहीं थी।’’ वे फिर चिल्लाए- ‘‘ऐसा क्या हुआ था कि आज तुम ठीक हो।’’ सुनीति भी उतनी ही जोर से उनके कान के पास जाकर चिल्लाइर्- मथ्ं ाली पीरियडस् 1⁄4महावारी1⁄2 चल रहे थ।े बाप रे चाचू तो बिल्कलु डर गए। इस तरह की बेबाक लड़की से पहली बार पाला पड़ा था। वे बेचारे चुप हो गए। इस तरह सुनीति ने जब काॅलेज में रंग दिखाना शुरू कर दिया।