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लेखक – डॉ. संगीता झा

”मम्मी, मैं कालेज जा रही हूं। शाम को देर से लौटूंगी आज मेडिसन की एक्स्टां क्लास है। डा. सुनीति मुस्करा उठती है शायद ये भी पिछले हफ्ते की तरह ही एक्स्टां क्लास हो, जिसमें सुनीति को बेटी के बैग से सिनेमा की टिकटें मिल गयी थी। जिसे दख्ेा कर भी उन्हानेें अनदख्ेाा किया क्यांिे क इतिहास की हमश्ेाा पनु रावृि न्̀ा होती है। इस तरह की कर्इ एक्स्टां क्लासेस उन्होंने अपने जमाने में अटेंड की थी बस फर्क इतना कि वो हास्टल में रहती थीं सो उनकी अम्मा इन क्लासेस का राज कभी जान ही नहीं पायी। अहमदाबाद बड़ा शहर होने से इशिता घर से ही कालेज जाती थी। सो अपनी क्लासजे का राज वो अपनी मां की जाससू ी आख्ाांें से नहीं छिपा पायी। मेडिकल कालेज में जाने से पहले पी.ए.टी. की परीक्षाएं और परिणाम सारा कुछ डा. सुनीति की आंखों के सामने घूमने लगा। समय का पहिया चलता रहता है और पीछे छोड़ जाता है ढेर सी यादें कुछ खम̂ी और मीठी। मजा तो तब आता है जब ये यादें आपको अपनी महक से सराबोर कर देती है और आप मजबूरन पीछे झांकने की कोशिश करते हैं।

मां-बाप की लाडली सुनीति बचपन से ही डाक्टर बनने का सपना देखती थी और उसे पूरा करने की भरपूर कोशिश भी करती थी। अगर मेडिकल में नहीं हुआ तो क्या करूंगी ऐसा ख्याल भी भूले भटके उसके दिमाग में कभी नहीं आया था। इस आत्मविश्वास से भरपूर लड़की ने तो बारहवीं के बाद बी.एस.सी. की कक्षाएं भी ज्वाइन नहीं की। पी.एम.टी. के परिणाम आने में बहुत समय लग रहा था। एक महीने के लिए वे अपनी दादी के पास चली गयी और गांव में चूल्हे को गोबर से लीपना आरै फिर लडक़ जलाकर खना बनाने का सनु ीति का वह पहला आरै आखिरी अवसर था। दिनभर गांव में घूमना और शाम को घर आकर सो जाना। इस तरह की दिनचर्या एक महीने से ज्यादा चलाना बड़ा कठिन था, लेकिन वह गर्व से तब झूम उठती जब गांव के सारे लोग उसे डाक्टर साहिबा के नाम से पुकारते। इसके बाद पी.एम.टी. के नतीजों में अखबार में उसका नाम पहले पचास लोगों में था। मा-ंबापकासीनातोगर्वसेचाडै़ाहअुाहीबलिकवेअपनेमाहेल्लेकीशानभीबन गयी। सनु ीति भी राजे खदु को अपने में सफदे काटे आरै स्टथ्ेाो के साथ दख्ेान लगी। घर में मां-बाप के पास लोग सलाह लेने आने लगे कि अपने बच्चों को कैसे लाइन पर लगाया जाए। पापा मां के रिश्ते के भार्इ-भतीजे, भांजे-भांजी के फोन आने शुरू हो गए। पापा भी गर्व आरै आत्मविश्वास के साथ किस तरह उन्हानेें अपनी लाडली को बचपन से पाला पर व्याख्यान दनेे लगत।े मां बचेारी कछु बाले ना चाहती तो पापा इसतरहचपु करदतेेमानाेंसनु ीतिअकले ीपापाकीहीबटे ीहा,े जिसेदख्ेामांकभी कुंि ठत हाते ी, कभी चुपचाप सुनती रहती। सुनीति तो मेि डकल काल जे जाने के लिए छटपटा रही थी। भले ही पी.एम.टी. में अच्छे अकं पा्र प्त कर लिए हाें पर दुि नयादारी में उसका ज्ञान बिल्कुल शून्य था। सुनीति के घर से थोड़ी दूरी पर पापा के दोस्त जायसवाल अकं ल रहते थ।े रिजल्ट सबु ह सात बजे अखबार में आया था। आठ बजे अपनी साइकिल पर सवार हो सुनीति जायसवाल अंकल के घर पहुंच गयी। जायसवाल अंकल का बेटा डाक्टर था। सुनीति के बार-बार कालबेल दबाने पर जायसवाल आटं ी ने साचा कि दध्ूावाला आया है क्यांिे क ये दध्ूावाले के आने का समय था। वे अंदर से ही चिल्लाने लगी- ”मैं आ रही हूं, इतनी जोर से घंटी न बजाओ। साहब आरै बटेा सो रहे ह,ंै नीदं खलु जाएगी। दध्ूा का बरतन लके र दरवाजा खाले ते हएु जब वे बाहर आयी तो दध्ूावाले की जगह एक उत्साहित पागल लडक़ ी को पाया। उन्होंने पूछा- ”तू चौहान साहब की बेटी है ना। इतनी सुबह-सुबह कैसे आयी? घर पर सब ठीक तो हैं न? अरे झल्ली तू ने बाहर बगीचे का गेट बंद ही नहीं किया। गाय घसु कर मरेे सारे फलू के पाध्ैो खा जाएगी। जा पहले गटे बदं कर आ। सनु ीति उतनी ही फुर्ती से दौड़ी और गेट बंद कर आयी। सुनीति के व्यकितत्व की एक बात बडी़ अच्छी थी कि वो कभी भी किसी बात का, डाटं ने का बरुा नहीं मानती थी। वापस आने पर उसके माथे पर पसीने की बूंद देख आंटी ने पूछा- ”बेटा, पानी पीएगी? सुनीति ने कहा- हां आंटी, एक गिलास ठंडा पानी पिलाइए। आंटी अंदर जाकर उसका पसीना पोंछने के लिए टावेल और पानी लेकर आयी। उन्हें शायद पता था कि इस झल्ली के पास तो रुमाल होगा नहीं। आजकल इतनी अच्छी आंटियां कहां मिलती हैं। उन्होंने फिर सुनीति से पूछा- ”अब बता तू कैसे आयी है? सुनीति ने झट से आंटी के पैर छू लिए और कहा- आंटी जी, मेरा पी.एम.टी. में सेलेक्शन हो गया है। मैं राकेश भै ̧या से टिप्स लेने आयी हूं। आंटी ने पहले ढेर सारा आशीर्वाद दिया आरै फिर बताया कि वो तो सो रहा ह।ै सनु ीति ने कहा- ”काइेर् बात नहीं आटं ी मैं इंतजार करूंगी। आंटी ने फिर सुनीति से बहस करना व्यर्थ समझा। उसे बैठक में बिठा वे अपने सुबह के कामों में व्यस्त हो गयी। करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद राकेश भैया नाइट सूट में मुंह में ब्रश लागए डांइंग रूम की तरह आए। सुबह-सुबह सुनीति की शक्ल में परेशानी देख हकबका गए। आज उनके पास बिल्कुल भी समय नहीं है, वे उससे संडे ही मिल सकते हैं कह कर सुनीति को रफादफा कर दिया। सबु ह-सबु ह की नाकामयाबी से भी न सनु ीति का आत्मविश्वास डिगा और न ही उसके उत्साह में कोर्इ कमी आयी। यहां घर में सभी सुनीति का इंतजार कर रहे थे। मां परेशान भी हो रही थी कि न जाने यह लड़की कहां चली गइर्। अल्हड़ सनु ीति तो अपनी साइकिल ले अपने सभी जानने वालाें में जिनके बच्चे या तो डाक् टर बन चुके थे या डाक् टरी की पढ़ार्इ कर रहे थ,े के घराें का चक्कर लगा रही थी। कहीं निराशा तो कहीं आशा का सामना करना पडा़ रहा था। लेि कन सनु ीति तो बस सपनों में दौड़ लगा रही थी। किसी ने कहा कि हमें पढ़े तो जमाना हो गया अब तो सब कुछ बदल गया है किसी ने कुछ पुस्तकों के नाम भी बताए जो सुनीति ने उन्हीं से पेपर लेकर वहीं लिख लिया। एक सीनियर, जो एक साल आगे थी, को सुनीति में एक मेधावी छात्राा दिखार्इ दी। उसने अपने एक क्लासमेट की कापी सनु ीति को अपने लिए उतारने दी आरै कहा ठीक एक हफ्ते में उसे दानेाें काप ी लाटैा दी जानी चाहिए। सुनीति तो बड़ी खुश मानों एक खजाने की चाबी या लाटरी का टिकट मिल गया हो। इठलाते बल खाते साइकिल के पैडलों में जोर-जोर से पैरों को मारते सड़क के बीचों-बीच साइकिल चलाती शाम चार बजे घर वापस पहुंची। मा-ं पापा को अपनी बटे ी की इन हरकताें की काफी आदत-सी थी। उन्हानेें उसे डाटां नहीं हल्की-सी फटकार लगार्इ कि सुबह से तुम्हें ढूंढते इतने लोग आ रहे हैं और एक तुम हो जो ऐसे गायब हुर्इ कि बस। सुनीति ने हंसते-हंसते उन्हें बताया कि वो तो अपने कालेज और डाक्टरी की पुस्तकों के बारे में ही पता करने गयी थी। मां-पापा भी अपनी इस होनहार बेटी की सोच कर गर्व करने लगे। उसने मां को बताया कि कालेज में तीन महीने जूनियर स्टूडेंटस को सफेद चूड़ीदार कुर्ता काले रिबन और काले जूते मोजे पहनने पड़ते हैं। मां-पापा को ये अलग खर्चा लगा फीस और पुस्तकों के अलावा। मां तो हार्इस्कूल में लेक्चरार थी उनकी एक बड़ी घनिष्ठ सहेली मिसेज भारद्वाज थी, जिनकी बिटिया इंटर्नशिप कर रही थी। उसने भी मेडिकल की पढ़ार्इ उसी कालेज से की थी, जिससे सुनीति करना चाह रही थी। मां ने अपनी परेशानी मिसेज भारद्वाज को बतार्इ और कहा- ”तुम अपनी बेटी से सारी सही बातें पता करना। मिसजे भारद्वाज के पास अपनी प्यारी सहले ी के लिए उन्̀ार तैयार था- अरे चौहान, तू चिंता मत कर। मेरे पास सुमन का सारा सामान वैसे के वैसे ही रखा है। कल मैं तुझे स्कूल में ही लाकर दे दूंगी। वादे के मुताबिक दूसरे ही दिन सारा सामान मिसेज भारद्वाज ने मिसेज चौहान को दे दिया। मिसेज चौहान ने तो मिसेज भारद्वाज के हाथों सारा पुराना सामान इस गर्व के साथ लिया मानों अपनी बिटिया की एम.बी.बी.एस. डिग्री ले रही हों। बाकी सारी शिक्षिकाओं को सनुाते हएु मिसजे भारद्वाज ने मिसजे चाहैान से कहा- ”घबराने की काइेर् बात नही।ं अब से तुम्हें कोर्इ भी डाउट या परेशानी हो तो सीधे मेरे पास आ जाना मैं पलक झपकते ही उसे दूर कर दूंगी। एक की बेटी डाक्टर बन चुकी थी और दूसरी की बेटी अब मेडिकल कालेज में प्रवेश पाने वाली थी। मिसेज चौहान और मिसेज भारद्वाज की दोस्ती ने अब नया रूप ले लिया। दोनों के बीच अब अधिकतर वातार्लाप का विषय उनकी प्रि तभावान बेि टयां थी।ं यहां सनु ीति अपने पापा आरै मां की सोच पर गर्व महसूस कर रही थी काश सभी मां-बाप उसके पापा और मां की तरह होते। अपनी बेटी की इच्छाओं और आशाओं को चौड़े नदी के पाट की तरह मंथर गति से आत्मा में बहने देते। एक नए समाज का निर्माण होता। कितनी ही बेटियों के बाप वर पक्ष के सामने निरीह होने से बच जाते क्योंकि उनकी बेटियां पढ़ी लिखी होनहार डाक्टर, इंजीनियर या कोर्इ आफिसर होती। कितनी ही नवबधुएं पिटने जलने से बच जातीं। लोग लड़की पैदा कर गर्व महसूस करते…. कितनी ही बेकसूर कन्याएं कोख में हत्या से बच जाती। जात बिरादरी और धर्म की इस्पाती दीवाराें के दरवाजे खिड़ि कयां खलु गए हाते ।े जीवन ।̊र्जा से भरा हातेा। लड़के-लड़की में कोर्इ फर्क न होता। जनता संघर्षशील, संतुष्ट व संपन्न होती। अपराध कम होते। देश ज्यादा तरक्की करता।

अब तो पापा-मां और सुनीति उस दिन की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे, जिस दिन उन्हें एडमिशन के लिए मेडिकल कालेज जाना था।