गगन में मेघ घिर आए।

तुम्हारी याद

स्मृति के पिंजड़े में बाँधकर मैंने नहीं रखी

तुम्हारे स्नेह को भरना पुरानी कुप्पियों में स्वत्व की

मैंने नहीं चाहा।

गगन में मेघ घिरते हैं

तुम्हारी याद घिरती है

उमड़कर विवश बूँदें बरसती हैं

तुम्हारी सुधि बरसती है-

न जाने अंतरात्मा में मुझे यह कौन कहता है

तुम्हें भी यही प्रिय होता। क्योंकि तुमने भी निकट से दु:ख जाना था

दु:ख सबको माँजता है

और चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किंतु-

जिनको माँजता है

उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें।

मगर जो हो

अभी तो मेघ घिर आए

पड़ा यह दौंगरा पहला

धरा ललकी, उठी, बिखरी हवा में

बास सोंधी मुग्ध मिट्टी की।

भिगो दो, आह

ओ रे मेघ, क्या तुम जानते हो

तुम्हारे साथ कितने हियों में कितनी असीसें उमड़ आई हैं?
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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन

मूल नाम : सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन
जन्म : 7 मार्च 1911, कुशीनगर, देवरिया (उत्तर प्रदेश)
भाषा : हिंदी, अंग्रेजी
विधाएँ : कहानी, कविता, उपन्यास, निबंध, नाटक, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण
मुख्य कृतियाँ
कविता : भग्नदूत, चिंता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्रधनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करुणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, पूर्वा, सुनहले शैवाल, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर-मुद्रा, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, महावृक्ष के नीचे, नदी की बाँक पर छाया, ऐसा कोई घर आपने देखा है (हिंदी) प्रिज़न डेज़ एंड अदर पोयम्स (अंग्रेजी)
उपन्यास : शेखर : एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी, बीनू भगत
कहानी संग्रह : विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप
यात्रा वृत्तांत : अरे यायावर रहेगा याद, एक बूँद सहसा उछली
निबंध : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मपरक, आधुनिक साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल, संवत्सर
संस्मरण : स्मृति लेखा
डायरी : भवंती, अंतरा, शाश्वती
नाटक : उत्तरप्रियदर्शी
अनुवाद : गोरा (रवींद्रनाथ टैगोर – बाँग्ला से)
संपादन : तार सप्तक (तीन खंड), पुष्करिणी, रूपांबरा (सभी कविता संकलन), सैनिक, विशाल भारत, प्रतीक, दिनमान, नवभारत टाइम्स (हिंदी), वाक्, एवरीमैंस (अंग्रेजी)
सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार
निधन
4 अप्रैल 1987