लेखक – डॉ. संगीता झा

गार्गी के पिता पेशे से वकील थे और उनके एक बहुत खास मित्र थे पाशा अंकल। जब भी गर्ग साहब रायपरु आते पाशा अकंल से जरूर मिलत। एक बार तो इन चारां सखियों को लेकर पाशा अंकल के यहां गए। वहां उनके यहां तो जैसे एक मिनी जू था। तोते, रंगीन चिडि़या, खरगोश और न जाने क्या-क्या? अंकल की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी और उनकी तीन बेटियां थीं। बड़ी दोनों समीरा और नूरीन बाॅम्बे मंे रहती थीं आरै अकंल की सबसे चहती छोटी नाजनीन अपने पति परवजे के साथ अमेिरकामंेरहतीथी।अकं लने उस जमाने मंेउन्हंेनाजनीन के घर की एक फिल्म दिखाइ | नाजनीन बेहत खूबसूरत थी और उसका घर तो माशा अल्ला बिल्कुल हिंदी सिनेमा में दिखाए जाने वाले घरों की तरह सुसज्जित, तरह-तरह के आधुनिक उपकरणों के साथ सपनों के महल की तरह था। उस दिन के बाद चारों के दिमाग मंेनाजनीन दीदी आरै उनका घर छा गया था।गार्गीबार-बारकहती-येसालाइंिडया बेकार है यहां कोई लाइफ है साली बढि़या एक एन.आर.आई. से शादी करो और फुरर्। गार्गी से बड़ी एक उसकी गीता दीदी थी जो अकसर हास्ॅ टल मंे आती थी आरै उस परू े गपु्र का एसे े ख्याल रखती मानो सब उनकी सगी छाटे ी बहनंे हा।ंे काफी अच्छे से वहां की स्थानीय छन्̀ाीसगढ़ी भाषा बाले ती थी, जसै े माले ा मालमू नई (मझु े मालनू नहीं), मैं नई जानों (मैं नहीं जानती), मरहीं ओमन (मरेंगे वे लोग) जैसे करही वैसे भर ही (जसै ा करगे ा वसै ा भरगे ा)। गीता दीदी बड़ी प्यारी आरै भाले ी थी। उनके महंु से छन्̀ाीसगढ़ी भाषा निकलने से भाषा का ही न्̈ाृंगार हो जाता था। जब भी किसी फंक्शन में जाना होता था गार्गी सुनीति और गरिमा के लिए भी गीता दीदी की साडि़यां लके र आती आरै गहनांे का तो गार्गी के पास अबं ार था ही। एक दिन गार्गी के घर से हाॅस्टल के फोन पर खबर आयी कि पाशा अंकल का अचानक देहांत हो गया है। गीता दीदी ने गार्गी से कहा नाजनीन दीदी दो दिनों बार अमेरिका से आने वालीहंैतो गार्गी उनसे जाकर मिल आएगी।गार्गीआरै उसकी सहेिलयांेनेनाजनीन दीदी को वीडियो फिल्म आरै उनके घर को भी वीडियो मंे दख्े ाा था। अब से सब पाशा अंकल की डेथ को भूल नाजो दीदी की खूबसूरती और उनके घर की कल्पना करने लगे। गार्गी बोली- ‘‘आई एम श्योर अगर हम नाजनीन दीदी को पिंच करेंगे तो उनकी स्किन लाल हो जाएगी। उनकी स्किन तो एकदम मक्खन जैसी है यार।’’ न जाने कितनी बातें। गार्गी ने सुनीति को अपने साथ जाने के लिए तैयार किया। जाने में दो दिन थे लेकिन तैयारी उसी समय शुरू हो गयी। तुरंत हीटर में पानी गर्म कर उसे बाल्टी में डाल कर स्क्रबर ले गार्गी और सुनीति पैर पानी में डुबा कर बैठ गए। बाप रे नाजनीन दीदी परै दख्े ागंे ी तो क्या कहगंे ी- ‘‘उफ, इंि डयन गल्सर्, कालॅ जे में पढ़ती हैं और पैर तो देखो?’’ गरिमा ने सलाह दी तुम लोग पानी में थोड़ा शैंपू भी डाल दा,े परै का मलै जल्दी निकल जाएगा। करीब आधे घटं े तक डुबाने के बाद परै ांे की एडियांे को घिस-घिस कर साफ किया गया। बाद मंे टावॅ ले से परै ांे को सख्ु ाा कर खूब सारा कोल्ड क्रीम लगाया गया। गार्गी के पास बड़ी अच्छी इम्पोर्टेड कंपनी की नेल पाॅलिश थी। शीतल ने दोनों सहेलियों के पेरों में नेल पाॅलिश लगा दी और हिदायत दी कि- तुम दोनों अब दो दिनों तक पैरों में मोजे ही पहने रहना, नहीं तो फिर धूल में खराब हो जाएंगे। उसके बाद शाम से शीतल ने दोनों के चेहरों पर मुल्तानी मिम̂ी तो कभी गुलाबजल के साथ चंदन का लेप भी लगा दिया। उन दिनों रायपरु शहर मंे ब्यटू ी पालर्र जाने का रिवाज भी नहीं था आरै ये लागे ज्यादा पसै े भी नहीं खर्च करते थे। शीतल ने दोनों को हीटर में पानी गर्म कर चेहरे में भाप लेने कीसलाहदी।कलु मिलाकरदानेांेसहेिलयां परूी तरह से इन दो दिनांेमंेअपनेआप को सजाने संवारने में लगी रही। जिस शाम को उन्हें पाशा अंकल की बेटी नाजो दीदी से मिलने जाना था उस दिन सुबह दोनों सहेलियां अपनी क्लीनिकल पोस्टिंग ही नहीं गयी। गार्गी आरै गरिमा गार्गी की साडी़ , सनु ीति आरै शीतल सनु ीति की साडी़ पे्रस करने में लगे रहे। हाॅस्टल में एक जूनियर जिसे सब प्यार से मोमो बुलाते थे नाम था मनप्रीत। वह स्टाइलिंग में माहिर थी। उसे शाम के लिए बुक कर लिया गया। मामे ो बचे ारी दिल से बडी़ अच्छी भी थी आरै ये उसकी फवे रटे दीदियां भी थी,ं सो उसने जल्दी अपनी बुकिंग भी कनफर्म कर दी। सुबह दोनों ने अपने सिर पर हास्ॅ टल की नाकै रानी जगु नबाई से नारियल तले की मालिश करा ली। उन लागे ांे का मानना था कि यदि तेल लाने के बाद शैंपू किया जाए तो बालों में निखार आ जाता है। सुनीति तो जितनी देर तेल सिर पर लगवाती रही, आंखें मूंदे प्रिंसेज नाजो के दरबार में जाने की कल्पना करती रही। मन ही मन अपने आपको बड़ी भाग्यवान भी समझती रही कि गार्गी ने प्रिंसेज नाजो के दरबार में जाने के लिए उसे ही चुना। वो बात अलग है कि शीतल और गरिमा ने तो पहले ही साफ कर दिया था। मान न मान मैं तेरा मेहमान, हम क्यों जाएं हम तो उन्हें पहचानते भी नहीं हैं। दोपहर कीपथ्ैाालाजॅीथ्यारेीआरैफामर्कालेाजॅीपै्रिक्टकलमंेतले लगेबालांेमंेकसकरचाटेी कर वे दोनों जब क्लास में घुसे तो सब लड़कियों ने कमेंट भी किया- ‘‘क्या बात है सीधे मालिश कराकर घसु रहे हो क्या?’’ सभी लड़कियां सटै रडे रात को तले लगा संडे सुबह शैंपू करती थी, सो कक्षा में कभी भी कोई तेल लगा चोटी कर नहीं आता था। लेकिन दोनों शाम के सपनों में गुम थे। क्लास से आने के बाद बालों को शैंपू कर डंायर से सुखा मोमो को आवाज़ लगाई। मोमो ने पहले सुनीति के बालों में छोटे-छोटे रंगीन क्लीप फंसा एक नयी हेयर स्टाइल की। गार्गी की हेयर स्टाइल भी देखते ही बनती थी। दोनों को कई जगह पिन लगाकर साड़ी शीतल और गरिमा ने पहनाइर्। उसके बाद चहे रे पीठ, दाने ांे हाथांे आरै गदर्न के पीछे फाउडं श्े ान लगा पाउडर लगाया गया। आंखों में मस्करा, आइ लाइनर, आई शैडो। सुनीति ने दो बार पलकें झपकाई तो सारा मस्करा गालांे पर लग गया। गरिमा, गागीर्, शीतल उस पर चिल्लाने लग-े ‘‘दख्े ा परू ा मके अप खराब हो गया।’’ फिर उसका चहे रा साफ कर सारी कवायद फिर से की गयी। सुनीति को गार्गी ने धमकी भी दी कि ‘‘अगर इस बार आंखें झपकाई तो तुझे नहीं ले जा।̊ंगी।’’ बेचारी सुनीति तो मस्करा लगने के बाद बड़ी देर तक बिना पलक झपकाए बैठी रही। दोनों तैयार होकर जब खड़ी हुई तो शीतल ने पे्रस हल्का गर्म कर साड़ी के सामने प्लेटों और पल्ले की तहों पर प्रेस मार कर फायनल फिनिशिंग दी। दोनों मित्रा अपने आप को आइने में देख खुद को पहचान ही नहीं पा रही थीं। दोनों ने अपने ओंठों को लिप्सटिक और लिपग्लाॅज़ की वजह से थाडे ़ा दरू -दरू ही रखा था। दाने ांे सजधज कर एक रिक्शे मंे बठै गयी जब वो लागे हाॅस्टल से निकल काॅलेज के गेट तक पहुंची तो उनकी क्लास के दो लड़के स्कूटर में काॅलेज की तरफ आ रहे थे। रिक्शे से आती तेज खुशबू ने उन्हें मजबूर किया कि वे अंदर झांक कर देखें कि अंदर कौन हैं? अंदर देखने पर वे अवाक् रह गए उनके मुंह आश्चर्य से खुल गए। उनके खुले मुंह देख गार्गी ने रिक्शे वाले से तेज चलाने के लिए कहा। अब सुनीति और गार्गी को लगा कि कहीं वे कार्टून तो नहीं लग रहे हैं। लेकिन फिर मन को समझाया कि फाॅरेन में सब इसी तरह रहते हैं। पाशा अंकल के दरवाजे पर पहुंचते ही आंखें नम हुईं। गार्गी ने सुनीति को जोर से डाटं लगाई ये नाटक मत कर फिर मस्करा आरै आइ लाइनर चहे रे पर फलै जाएगा।’’ काॅलबेल दबाने पर अंदर से एक मीठी आवाज आई- ‘‘यस, हू इज दिस।’’ गार्गी ने आवाज़ मंे मधरु ता लाते हएु जवाब दिया, ‘‘आइर्, गागीर्’ ’ अदं र से आवाज़ आयी- यस, कम इन।’’ दोनों अंदर गयीं एक कमरे में नाजनीन दीदी अपने सामने कुरान लिए सिर ढंके बैठी हुई थी। आंखें उठाकर दोनों को देखा और आंखों के ही इशारे से उन्हें बैठने कहा। दोनों सोफे पर बैठ गयीं। नाजनीन दीदी लैला मजनू की लैला, शीरीं फरहाद की शीरीं जैसे लग रही थीं। वो तो कल्पनाओं से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत और हसीन थी। कंधे तक कटे हुए घुंघराले बाल, बाएं गाल का गड्ढा, तराशी र्हइु भव,ंे जानलवे ा आई लश्ै ाश्े ा, तीखी नाक, एक पल को लगा इतनी खबू सरू ती तो सिर्फ कल्पनाएं हाते ी ह।ंै दीदी ने करु ान बदं कर बडे़ विस्मय से गार्गी आरै सनु ीति को देखा फिर सोचा शायद इन्हें मालूम नहीं कि अब्बा का इंतकाल हो गया। इसी से इतना सज कर आयी हैं। उन्होंने पूछा- गोइंग फाॅर ए पार्टी, ओ गार्गी यू डोंट नो अब्बा पास्ट अवे डे बिफोर यस्टरडे। गार्गी और सुनीति को तो जैसे काटो तो खून नहीं। लड़खड़ाते-लड़खड़ाते गार्गी ने कमन संभाली और धीरे से टूटी-फूटी जबान में जवाब दिया- ‘‘या या, वी वेयर गोइंग फाॅर ए बर्थडे पार्टी। आपका घर बीच में था तो लगा अंकल से मिल लें।’’ आवाज़ कांप रही थी। नाजनीन दीदी ने कहा- ‘‘कम आॅन यार व्हाय आर यू सो स्केयर्ड, यंग गल्र्स अभी नहीं तैयार होंगे तो कब- ‘‘नाॅट बडै , मके अप पालर्र से करा कर आ रहे हो क्या? आई डिडन्ट नो रायपरु मंे भी इतना अच्छा मेकअप होता है।’’ एक चुप्पी सी पसर गयी। दीदी ने अपने हसबैंड को आवाज़ दी- ‘‘परु, कम कम सी हू हैज कम, गर्ग अंकल्स ऐंजल गार्गी रिमेम्बर कितनी छोटी थी याद है अब्बू की गोदी से उतरती ही नहीं थी। लुक एट हर, हर हेयर स्टाइल, मेकअप वावो साड़ी तो देखी ही नहीं। गार्गी साड़ी भी पहनती है।’’

सुनीति के दिल मंे हकू सी हुइर्, वाह, अमेि रका मंे पत्नी पति का नाम शाटर्फ ार्म कर कितने प्यार से पकु ारती है आरै यहां एजी सनु ते हो शायद ये अबे 1⁄4य1⁄2े गधे 1⁄4जी1⁄2 का शार्टफार्म है। शादी तो एन.आर.आई. से करनी चाहिए, तभी वो उसे सु कहकर पुकारेगा। गार्गी भी अपने परु जीजाजी जो रति के कामदेव थे, मंत्रामुग्ध नजरों से देख रही थी और सोच रही थी कि फिर वही साला इंडिया बेहूदे पति, इंडियन पत्नी की एक पुकार पर तो पास आते ही नहीं। मोहनिद्रा परवेज के प्रश्न से भंग हुई- व्हाट्स अप गार्गी लुकिंग दिस इस युवर ल्́ेंड व्हाट्स हर नेम? इज शी आल्सो डूइंग मेि डकल स्कलू विथ य।ू गार्गी तो बस या या कर रही थी, जो उसने हाल ही मंे दख्े ाी अंग्रेजी फिल्म से सीखा था। सुनीति तो आंखें फाड़-फाड़ कर कभी परवेज कभी नाजनीन फिर गार्गी के मुंह को देख रही थी, उसकी तो या या करने की बारी आ ही नहीं रही थी। मुंह खोलने में भी डर लग रहा था। थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद दीदी ने नौकरानी से कह उन दोनों को अमेरिकन कोक पिलवायी। गार्गी तो परू े वातार्ल ाप मंे या या, नो ना,े थक्ंै यू के सिवाय कछु बाले ी नही।ं थाडे ़ी दरे बाद एक बहतु हडंै सम, लबं ा, गारे ा चिकना स्मार्ट लड़का वहां आया। नाजनीन दीदी ने गार्गी से कहा- ‘‘ओह, गार्गी मीट जुनैद समीरा आपा स एलडेस्ट सन। ही हैज फिनिश्ड हिज मास्टर्स इन यू एस ए एंड वर्किंग विथ मल्टीनेशनल देयर ओनली।’’ गार्गी और सुनीति की आंखें एक साथ चमकीं। वाह रे, एन.आर.आई. साथ में मल्टीनेशनल फर्म। फिर दीदी ने जुनैद से कहा- ‘‘ये है तुम्हारे गर्ग नानू की परी गागीर्। ’’ जनु दै उछल पडा़ वावा,े गार्गी ने शर्म से आख्ं ांे नीची कर ली। जनु दै तो फ्लर्ट करने में उस्ताद था। सुनीति बेचारी तो गार्गी की ल्́ेंड बनी बैठी हुई थी। अभी तक उससे किसी ने नाम भी नहीं पछू ा था। वाह र,े गार्गी आरै उसकी किस्मत, इतना स्मार्ट लडक़ ा लाइन मार रहा था। उसकी गहरे नीले रगं की इम्पाटे र्डे टी शर्ट के पीछे लिखा था- ‘‘हीरो एटी त्राी।’’ सचमुच वह सन् तिरासी का हीरो था। अब वहां से वापस निकलने की बारी थी। नाजनीन दीदी ने कहा- ‘‘ओह, इट्स लेट जुनैद विल डंाप यू। अंधा क्या चाहे दो आंखें इस उन्̀ार से सुनीति पूरी तरह उछल पड़ी के रास्ते में जुनैद से बात कर लेगी। जुनैद तो अपनी खाला के इशारे का न जाने कब से वेट कर रहा था। जल्दी से अंदर जा अपने दिवंगत नाना की खुली जीप लेकर हाजिर हो गया। उस जमाने में अपने किसम की पूरे रायपुर में अकेली जीप थी। सामने जुनैद के साथ गार्गी बैठी और पीछे फिर सुनीति। मन किया इतना सज कर आई हूं फिर भी एक बार मुड़कर देख नहीं रहा। वहां तो कबूतरों की तरह गुटरगूं चल रही थी। उन दिनों विनोबा भावे हंगर स्टंाइक में बैठे थे, जो जुनैद ने गार्गी से पूछा – ‘‘व्हाट्स योर ओपिनियन एबाउट विनोबा जी स हंगर स्टंाइक। व्हाट डू ये थिंक इट्स नाॅट सुसाइड।’’ गार्गी का उन्̀ार- ‘‘या या।’’ सुनीति ने मन ही मन इंग्लिश में भाषण तैयार किया कि ये गार्गी तो या या कर रही है। मैं ही क्यों न जवाब दे द।ंू पर जुनदै तो इस तरह गार्गी मंे खाये ा हुआ था कि पीछे र्काइे  बठै ा है इसका उसे र्काइे  अदं ाजा भी नहीं था। उसने दसू रा पश््र न दागा- ‘‘गार्गी व्हाटस् यवु र हाबॅ ी।’’ अब तक गार्गी थाडे ़ा अगं जे्र ी सीख गयी थी। तपाक से उन्̀ार दिया- ‘‘नथिगं स्पेि शफिक। टाइम ही कहां मिलता है कोई हाॅबी परस्यू करने का पढ़ाई जो इतनी रहती है।’’ जलन से सुलगी सुनीति के अंदर से आवाज़ आई- बड़ी आई पढ़ाई वाली हर दिन गपियाती रहती ह,ै अगं जे्र बच्ची, परू ा सटंे न्े स क्यांे नहीं अगं जे्र ी़ मंे बाले ी। लेि कन तभी जनु दै का फ्लर्ट करता हअु ा जवाब गजंू ा- आहे आई फारॅ गाटॅ डाक्ॅ टर साहिबा यू पीपल हवै टू स्टडी ए लाटॅ आई मस्ट एडमिट दटै आई सल्ै यटू टू डाक्ॅ टसर्। ’’ गार्गी चहचहाई – ‘‘थैंक्स।’’ अब तो सुनीति ने सोचा कि सपने देखने से मुझे कौन रोक सकता है। झट से सपनों में गार्गी को जुनैद के बगल से उठाया और खुद बैठ गई सपनों में जुनैद- ‘‘ओह, आई सी हू इज दिस ब्यूटीफुल लेडी।’’ सुनीति लड़खड़ाती जबान में उन्̀ार देती है- ‘‘आई सुनीति।’’ जुनैद तपाक से कहा है- ‘‘युवर आइस 1⁄4आंखें1⁄2 आर वेरी एक्सप्रेसिव’’ सुनीति कहती है- ‘‘थैंक्स ए लाॅट।’’ जुनैद- ‘‘नाउ टेल मी व्हाट्स युवर ओपिनियन एबाउट विनोबा भावे स हंगर स्टंाइक।’’ सुनीति तपाक से जवाब देती है- ‘‘इट्स विनोबाजी स वे टू प्रोटेस्ट अगेनस्ट गवर्नमेंट। ही इज ए सेंट हू इज वकिर्गं फारॅ वले फये र आफॅ फामर्स र्। आई डान्े ट कालॅ इट ससु ाइड। ही वाटस् टू अटक्ें ट गवनर्म टंे स् अटश्ंे ान टवू र्ड फामर्र्स पा्र ब्ॅ लम।’’ अचानक गार्गी ने झकझारे कर उसे सपनों से निकाला- पागल क्या आयं बायं बक रही है सो गयी क्या? हाॅस्टल आ गया चल उतर। जुनैद ने भी इस पागल लड़की को देखा। सुनीति हड़बड़ाकर उठी और जीप से नीचे कूदी। गार्गी चिल्लाई- पैर तोड़ेगी क्या? जीप से उतरना भी नहीं आता। फूहड़ सुनीति ने अपना देहातीपन उस हीरो जुनैद को भी दिखा दिया। गार्गी और जुनैद ने एक-दूसरे को बाय कहा और जुनैद तेजी से जीप घुमाते हुए वापस चला गया। गार्गी ने सुनीति को जारे से डाटं ा- ‘‘मखर््ू ा पगली सपने दख्े ाना बदं कर, पहले सलीम सिकारे ा अब जनु दै आबिदी।’’ बचे ारी सनु ीति चपु चाप सिर झकु ाए अपने कमरे मंे आ गयी। मन मंे बडा़ अफसासे रहा कि इतना सजना भी व्यर्थ गया। अब डाॅ. सुनीति उस पुराने सपने से निकल कर बाहर यथार्थ में आती है, सोचती है उस जमाने मंे वे लागे किसी को सिर्फ सपने मंे भी डर-डर कर चाहते थे आरै आज उनकी बेटी इशिता और उसकी सहेलियां खुले आम एक-दूसरे से फोन पर अपने माता-पिता की उपस्थिति में कुछ इस तरह की बातें करते हैं-
इशिता- ‘‘ओह हाय, हाउ युवर डेटिंग इज गोइंग आॅन एन प्रोग्रेस आॅर स्टिल द सेम।’’ उसकी सहेली जवाब देती है- ‘‘वी ब्रोक आॅफ यार नाउ माई स्टेट्स इज सिंगल ही वाज नाॅट आॅफ माइ काइन्ड। वेरी पजेसिव आई डोंट लाइक एनी वन टू बाॅस ओवर मी कहां गयी थी? किसके साथ गई थी, किससे बात कर रही थी, बड़ी देर से फोन टंाई कर रहा हूं। आइ जस्ट सेड माइन्ड युवर ओन बिजनेस आई एम नाॅट युवर स्लेव उसके बाद उसका कोई फोन नहीं आया।
इशिता उसे कहती ह-ै ‘‘कागं चे्र लु श्े ान, मंै तो पहले ही सरपा्र इज्ड थी कि तू उसके साथ कसै े बढ़ रही है स्टुि पड रटे ां गे े्रि सव मले शाउनिस्ट मनै पता नहीं गाडॅ नाजे उसमंे ऐसा क्या था? एनी वे आई एम वेरी हैप्पी फाॅर यू नाउ ज्वाइन द क्लब आॅफ ल्́ी बर्ड्स।’’ डाॅ. सुनीति अवाक रह जाती है कि आजकल लोग रिश्ते टूटने में बधाई देते हैं और जश्म मनाते हैं। इशिता को डांटती है- ये तुम क्या बात कर रही हो।
इशिता का जवाब- ‘‘मेरी जासूसी करना बंद करें मम्मा जस्ट माइन्ड योर बिजनेस। डोन्ट पोक युवर नोज। जमाना बदल गया है। ज्यादा तंग करोगी तो मैं हाॅस्टल में शिफ्ट हो जा।̊ंगी। आई नीड माय ओन स्पेस।’’ डाॅ. सुनीति निरुन्̀ार हो अपनी बढ़ती बेटी को आश्चर्य से देखती रहती हैं।
इसके सिवाय उनके पास कोई चारा भी तो न था।