college first dayलेखक – डॉ. संगीता झा

आज कॉलेज का पहला दिन था। रात से ही सुनीति ने अपनी सफेद ड्रेस प्रेस कर रखी थी। काले जूते भी टनाटन पालिश थे। दो काले फीते बिस्तर के किनारे रख दिए। सुबह छ: बजे की लोकल पकड़ कर उसे रायपरु जाना था। कलेजा निकलकर हाथों में आ रहा था। जहां एक तरफ उत्साह था, वहीं दूसरी तरफ रैगिंग को लेकर मन में एक अजीब सा डर था। डर और उत्साह की उस आंख मिचौली में सुबह के पांच बज गए। सुनीति ने जब सफेद कुर्ते में अपने आप को फिट किया तो ऐसा लगा मानों कपड़े को सुनीति के ।̊पर रख कर दर्जी ने सी दिया हो। सुमन और सनु ीति के डीलडालै में काफी अतं र था। ये बात मिसजे चाहैान आरै मिसजे भारद्वाज दोनों ही भूल गए थे। मरता क्या न करता उस कुरते में अपने आप को फिट करने के अलावा सुनीति के पास कोर्इ चारा भी नहीं था। चूड़ीदार का भी ऐसा ही हाल था। जब सुमन भारद्वाज ने कालेज में एडमिशन लिया था उन दिनों छोटे-छोटे जांघ तक आने वाले कुरते का फैशन था। अब सुनीति के समय घुटनों ते लंबार्इ के लिए कुरते का फैशन आ गया था। लेकिन इन बातों को सुनीति ने आदतानुसार नजर अंदाज कर दिया। सुनीति की व्यथा यहां ही नहीं खत्म हो जाती थी इसके बाद उन जूतों की बारी थी जिसमें छ: सालों से किसी ने भी अपने पैर नहीं रखे थे। वे जूते तो सिकुड़कर अपने नाप से आधे हो गए थे। किसी तरह खींचतान कर थोड़ी देर अपनी पुरानी चप्पल उसके अंदर घुसा सुनीति ने अपने पैरों को उसके अंदर घुसा लिया। इस तरह तैयार होकर वो स्टेशन की ओर निकल पड़ी। उन टाइट कपड़ों में सुनीति के शरीर के सब उभार बड़े वीभत्स लग रहे थे। सुनीति ने सोचा इतने सारे जूि नयर्स की भीड़ में मझुे कानै दख्ेागेा। स्टश्ेान पर सनु ीति को दख्ेा भिलार्इ से रायपरु जाने वाले सभी सीनियर्स ओर उसके साथ वाले सारे जूनियर्स पेट पकड़-पकड़ कर

हंसने लगे। सुनीति तो इन सबसे बेखबर अपने सपनों में खोर्इ हुर्इ थी। उसकी ये हालत देख टेंन में उसकी नयी सहेलियों ने भी उससे कन्नी काट ली। उन्हें लगा यदि वे सनु ीति के साथ रहीं तो खामखाह वे भी रैि गगं में फसं जाएगं ी। जसैे ही रिक्शे से उतरकर सुनीति बड़े गर्व के साथ कालेज के प्रमुख द्वार से अंदर घुसी। सारे सीनियर्स की आंखें फटी की फटी रह गयीं। पूरे कालेज के इतिहास में ऐसा नमूना शायद पहली बार आया था। हर सीनियर की बांछें खिल गयी कि आज रैगिंग लेने में बड़ा मजा आएगा।
सुनीति के टाइट कुरते और टाइट चूड़ीदार ने उन्हें पुराने जमाने की पिक्चरों की याद दिला दी, जिसमें ममु ताज, आशा पारख्ेा या सायराबानो इस तरह छोटे कुर्ते आरै टाइट चूड़ीदार पहने रहती थी। किसी ने सुनीति  देख गाना गाया- आह आजा आजा, तो कोई गाने लगा – भई, बद्दूर भई बद्दूर, अब जाएंगे कितनी दूर। इस तरह न जाने कितने पुराने गानों की बारिश होने लगी। एडमिशन के दिन बनी उसकी सहेलियां और पिछले कालेज की सहेलियां भी ये नजारा देख दूर हट गयी। सुनीति बेचारी रुआंसी सिर झुकाए खड़ी रही। मन ही मन अम्मा पर झुंझला रही थी। न अम्मा समु न भारद्वाज के कपडे़ लाती, न उसकी शामत आती। सनु ीति तले लगे बाल, दो चोटी, बदन के कसावों को वीभत्स रूप से प्रदर्शित करते कपड़े सब कुछ एक हारर मूवी की तरह लग रहा था। एक सीनियर ने तो ये भी कहा कि फोटो लेते हैं बाद में बच्चों को डराने में काम आएगी। बाकी सुनीति के साथ के जूनियर्स चैन की सांस ले रहे थे कि सुनीति की वजह से उनकी जान रैगिंग से छूट गयी। सुनीति चपु चाप सिर झकुाए सारे सीनियर्स के ताने सनु रही थी। दरू से एक जारे से आवाज आयी- खबरदार! सावधान! किसी ने सुनीति को छेड़ा। मैं सुनीति के साथ होते अन्याय को नहीं दख्ेा सकता, मंै सनु ीति की रक्षा करूगां। आज से सनु ीति मरे ी बहन है। फिर एक साथ बम की तरह कर्इ ठहाके छूटे। सभी सीनियर्स एक साथ चिल्लाए-सनु ीति बहन जिदांबाद आरै परूा गपु्र सनु ीति को छाडे ़ दसू रे लड़क-े लड़कियाें की तरफ बढ़ गया। सुनीति ने राहत की सासं ली। उस सीनियर का नाम अखिलश्ेा चतवु र्दे ी था। एसेा सनु ीति को बाद में पता चला। उसने तो सनु ीति का मजाक बनाने और नीचा दिखाने के लिए उसे बहन बनाया था लेकिन मजाक ही मजाक में बना रिश्ता समय के साथ गहराता गया और जब तक सुनीति कालेज में रही अखिलेश उसके भार्इ बने रहे। उसके बाद सुनीति की किस्मत से कालेज के सारे स्टूडेंटस की स्टांइक हो गयी और कालेज 15 दिनों के लिए बंद हो गया और सुनीति को अपने नाप के कपड़े सिलाने और जूते लेने का समय भी मिल गया। वापस घर पहुंचते ही अम्मा के साथ तुरंत दर्जी के पास अपने नाप के कपड़े सिलवाने निकल पड़ी।