Admission (1)लेखक – डॉ. संगीता झा

आखिर आज वो दिन आ ही गया जब सुनीति को पापा के साथ एडमिशन के लिए मेिडकलकालजे जानाथा।रात भर सनुीति बिस्तर में करवटें बदलती रही। कसैे हागेा वो कालेज….वो प्रिंसिपल का आफिस क्या सुनीति खुशी से पागल हो रही थी…. कल कौन-सी डेंस पहनूंगी…..चीखने को दिल चाह रहा था। आंखें बंद कर कितनी ही बार चीखी आरे हरके बार महससू किया जसैे डाक् टर शब्द से परूा वायमु डं ल भरा हुआ है। सुनीति ही घटना है और सुनीति ही कारण है। खिलखिलाने को मन कर रहा था। उसकी सासांें तजे थी,ं धड़कनें गहरी।ं रगाें में अजीब सी सिहरन। यह सब क्यों न हो। बचपन से संजोया सपना साकार जो होने जा रहा था। पापा के साथ सुबह छ: बजे की लोकल से सुनीति को भिलार्इ से रायपुर जाना था। सुनीति तो सबु हतीनबजेसेहीनहाधाके रतयैारबठै ीथी।रिक्शावालासबु हपाचं बजेआने वाला था। घड़ी के घटें माने पाचं बजाना ही न चाहते हा।ें बचेारी सनु ीति तो पत्र ीक्षा में पागल हो रही थी। कालेज जाने के नाम पर उसे लग रहा था मानों विश्व के उस छोर पर जा रही हो। कल्पनाओं में सोच रही थी कि पृथ्वी की परिक्रमा करूंगी।….पहाड़ों पर चढूँगी। जंगलाें में दौडूँगी…महासागराें में बहंूगी। बं्̃राडं का भगूाले उनकी कल्पनाएं थी,ं जिनमें जीवन सी गति थी आरै गतं व्य स्थान था रायपुर मेि डकल काल जे । सुनीति का लबां इतं जार खत्म हुआ आरै सुबह साढ़े आठ बजे वो और पापा रायपुर मेडिकल कालेज के मेन गेट पर खड़े थे। कालेज पहुंचने वाले वे पहले लोग थे, एडमिशन प्रक्रिया साढ़े नौ बजे से होनी थी। जिस तरह कार्तिकेय ने अपने माता-पिता शंकर और पार्वती की परिक्रमा की थी ठी उसी तरह सुनीति और पापा मेडिकल कालेज के अंदर चक्कर लगाने लगे, मानो ब्रं̃ांड की सैर कर रहे हों। कालेज बिलिडंग के ।̊पर लिखा हुआ लोगो पापा ने सुनीति को दिखाया, जिसमें लिखा हअुा था- सवेा, साधना, त्याग। बस फिर क्या था सनु ीति ने पण््रा कर लिया इन तीनों चीजों को अब वो अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लेगी। यहां आकर ही सुनीति को पता चला कि कालेज पिं्रसिपल नहीं डीन ही कालेज प्रधान थे। सुनीति और पापा फिर डीन आफिस के प्रतीक्षालय में दूसरे अभिभावकों और विधार्थियों के साथ बैठ अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे। यहां सुनीति को तीन सहेिलयां मिलीं जो आजतक उनके दिल में अपनी जगह बनाए हएु ह।ंै उनमेंतीनाें ही भिलार्इ नगर के पास दुर्ग से थी गार्गी गर्ग, गरिमा सिन्हा और शीतल बंसल। सुनीति की एक पुरानी सहपाठी मृदुला जोशी का भी उसके साथ चयन हुआ था, लेकिन उसे आज एडमिशन के लिए नहीं बुलाया गया था। शीतल के पिता का देहांत हो गया। इससे वो अपनी अम्मा के साथ आयी थी। पापा की गार्गी और गरिमा के पापा से बड़ी अच्छी दोस्ती हो गयी। गार्गी के पापा वकील और गरिमा के पापा प्रोफेसर थे। सुनीति ने इन तीनों नयी सहेलियों से कहा, ”अभी तो एडमिशन में बहुत देर है, चलो तब तक कालेज घूम आते हैं। शीतल की बड़ी दादी डाक् टर थी आरै छाटे ी इसी काल जे में फाइनल इयर में थी इससे उसे मेि डकल कालेज के कानून कायदे पहले से ही मालूम थे। उसने सुनीति को झिड़की दी ”पागल, बाहर निकलेंगे तो सीनियर्स रैगिंग करेंगे। चुपचाप यहीं बैठते हैं। बचपन और लड़कपन की यही तो एक खासियत होती कि जल्दी ही अच्छे दोस्त मिल जाते हैं और सब निष्कपट होते हैं और आज उम्र का ये पड़ाव डा. सुनीति कछु अच्छे दास्े ताें आरै कछु परुानी यादाें के सहारे ही काट रही ह।ंै यहां तीनाें पिता बड़े जोर-शोर से अपनी बेटियों की तारीफों के पुल बांध रहे थे। इन लड़कियों ने अपने पिताओं को भी स्नेह की डोर में बांध दिया। बीच में सुनीति, गार्गी और गरिमा को कूलर का ठंडा पानी पीने के बहाने बाहर ले गयी। तीन जूनियर देख सीनियर्स के झुंड ने उन्हें घेर लिया, तरह-तरह के सवाल पूछने लगे, सुनीति तो सभी प्रश्नों का बेबाक उन्̀ार देने लगी। लेकिन गरिमा और गार्गी तो सिर्फ सिर झुकाए खड़ी रही। सुनीति को अपनी इस बेबाकी और अल्हड़पन की कीमत कर्इ दिनों तक चुकानी पड़ी। इधर तीनों पिता अपनी लड़कियों को गायब देखकर परेशान हो उठे। सुनीति के पापा ने गर्ग साहेब और सिन्हा साहेब से कहा- ”आप लोग आराम से बैठिए, मैं देखकर आता हूं। पापा तो फिर सुनीति के पापा थे। उन्होंने जब देखा कि उनकी बेटी और उसकी सहेलियों को सीनियर्स घेर कर खड़े हैं। पापा ने तो शेर की तरह गर्जना कर रहा- ”छोड़ो इन लोगों को, तुम लोग भी अपनी क्लास में जाओ। आप अपने कालेज में आने वाले नए बच्चों का इस तरह स्वागत करते ह।ंै लानत ह,ै अभी डीन से आप सबकी शिकायत न की तो मरेा नाम भी चौहान नहीं। सीनियर्स तो चले गए लेकिन सुनीति चौहान ये नाम उन्होंने अपने मसितष्क की डायरी में नोट कर लिया जिसका खामियाजा सुनीति को बाद में चुकाना पड़ा। अदं र आने पर शीतल ने उन तीनाें को प्यारी डाटं लगार्इ कि ”मनंैे तो पहले ही मना किया था। बाहर सीनियर्स पकड़ लगें ।े  शीतल की अम्मा ने उसके एडमिशन के बाद तीनाें पिताआें को नमस्ते कर अपनी बटे ी से विदा ली। यहां गार्गी के पिता जो अपने पेशे और रिश्तेदारों की वजह से इस शहर से काफी वाकिफ थे, सभी को पास के मद्रासी होटल में डोसा, इडली खिलाने ले गए। अपनी-अपनी बेटियों की सफलता ने पिताओं के चेहरे को भी आत्मविश्वास से भर दिया था। श्रीमान गर्ग ने वेटर को जोर से आवाज लगा कर कहा- जल्दी से हमारे आर्डर का सामान लेकर आओ, नहीं तो ये तीनों डाक्टर साहिबा तुमको सुर्इ लगा देंगी। वेटर मन ही मन हसं ने लगा। यहां तो राजे बीस-पच्चीस डाक् टर मरेे हाथ का खाना खाकर जाते ह।ंै दरे करने पर अगर सभी सइुर्  लगाने लगते तो मंै राजू से छदे ीलाल बन गया हातेा। सभी ने खबू छक कर दक्षिणी व्यजं नाें का लत्ु फ उठाया आरै एक-दसू रे से विदा ली। सुनीति तो अब परी बन गयी थी। मेडिकल कालेज में एडमिशन जो हो गया था। प्रथम एम.बी.बी.एस. कक्षाएं 15 दिन बाद शुरू होनी थी। 15 दिनों में सुनीति ने अपने सपनों में सारे जहान की सैर कर ली – कैसा होगा वो पहला दिन…..वो डेड बाडी, कहीं मैं डरूंगी तो नहीं…..नहीं अगर हिम्मत न रखी तो अच्छी डाक्टर कैसे बनूंगी। रोज सपने में गले में स्टेथो लगाए सुनीति चार-पांच मरीज जरूर देख लेती थी। ठीक सिनेमा की तरह इमरजेंसी आपरेशन कर बाहर आ रिश्तेदारों से कहती- ”भगवान का लाख-लाख शुक्र है आपके मरीज की जान बच गयी। रिश्तदेार उसके परै पकड़ लतेे वह गर्व से फलू ी नहीं समाती। कभी आख्ाांें पर चश्मा लगाये गभ्ांीरता से डाक् टरी की पस्ु तक पढत़ ी। सबु ह मां जारे से चिल्लाती ”उठा-े उठा,े आठ बज गए। सूरज कब उग गया। सुनीति झल्लाती हुर्इ अपने सपनों से निकलती ”क्या मा,ं अच्छा सपना दख्ेा रही थी, आपने ताडे ़ दिया। इस तरह सपने देख-देख 15 दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।