sweet_memories

कहां तो सुनीति की जिंदगी में रंग थे, सपने थे, उत्साह था, उमंग थी और न जाने ईश्वर ने उसकी जिदंगी को कितनी सारी  से नवाजा था आरै सब कछु अब सुनीति को धराशायी नज़र होता आ रहा था। पर करे भी तो क्या करे, ओखली में सिर दे दिया है तो मूसल का क्या डर। ये शायद सिर्फ शुरूआती दिनों की बात है उसके बाद सनु हरा भविष्य तो है ही जो बसे बी्र से उसकी पत्र ीक्षा कर रहा ह।ै एसे ो साचे कर सनु ीति ने अपने आपको ढाढं स बध्ं ााया। कल तो सिर्फ एनाटामॅ ी डिसक्े शन हाॅल में सबका आपस में परिचय ही कराया गया था। आज असली क्लास की शुरूआत थी। सुबह उठते ही पहले सुनीति ब्रश कर रीता गुप्ता दीदी के रूम में नाश्ता बनाने गयी। हीटर पर काम करने का सनु ीति का ये पहला अवसर था, इसके पहले तो घर में गैस चूल्हा ही देखा था। ज्यों ही सुनीति ने हीटर पर कढ़ाई रखी, रीता गुप्ता दीदी तो डर गयी, बोली- ऐ….हीटर जलाकर कढ़ाई रखना। पैरों में रबर की स्लीपर जरूर होनी चाहिए नहीं तो शाॅक भी लग सकता है। किसी तरह जैसे तसै े रीता आरै हरजीत दीदी का नाश्ता बना सनु ीति ध्वनि गजंू ती रही। सारे सीनियर्स जो पढ़ रहे थे न तो डांटने के मूड में थे, न रैगिंग लेने के। सुनीति की तो समझ से परे था कि इस तरह उसके धम धम दौड़ने की वजह से किसी को भी परेशानी हो रही है। जल्दी से रूम में पहुंच आनन-फानन में तैयार हो एनाटाॅमी डिसेक्शन हालॅ की तरफ वसै े ही दाडै ़त-े दाडै ़ते निकल पड़ी। जाकर सीधे अपने डडे बाडॅ ी वाली टेबल पर बैठकर ही दम लिया। डिस्केटर खाले कर जो पहला सबक याद करना था वो था ‘एनाॅटमीकल पोजिशन आॅफ द बाॅडी’। टेबल में से तीन तो अंग्रेजी माध्यम से पढ़ी थीं, तो वे सब अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस कर रही थीं। बाकी बची सुनीति, शभ्ु ादा, शीतल आरै स्नहे ा ने उसका अपनी तरह से हिदं ी अनवु ार किया जो कछु इस पक्र ार था- ‘‘एनाटाॅि मकल पाजे ीशन शरीर की वह स्थिति है जिसमंे शरीर सीधे लटे ा रहता है हाथ दोनों शरीर के बाजू में और हथेलियां खुली आसमान की तरफ और आख्ं ांे भी क्षितिज को ताकती र्हइु तथा दाने ांे परै फलै ाकर सीधे रखे रहते ह।ंै ’’ लगातार चारों यह रटे जा रही थी। उनकी एनाटाॅमी की रीडर जैसे ही उनके टेबल पर आयी उन्हानंे े शभ्ु ादा की तरफ इशारा कर अगं जे्र ी मंे पछू ा‘ व्हाट इज एनाटाॅि मकल पाजे ीशन। शुभदा का जवाब था….शरीर की वह स्थिति…..सुनकर तो उन्हें मानो चक्कर आ गया। पूरे जीवन के इतिहास में मुखर्जी मैडम ने ऐसा जवाब पाया था। अपनी हंसी रोकते हुए उन्होंने गुस्से से कहा- ‘‘व्हाट रबिश, टेल मी इन इंग्लिश।’’ और गुस्से से उनका डिस्केटर उठाकर कोने में फेंक दिया और कहा- ‘‘जहां डिस्केटर गिरा है वहीं जाकर खड़े हो दीवार की तरफ मुंह कर याद करो जब याद आ जाए तो टेबल पर वापस आकर अपना हाथ उठा लेना।’’ बाप रे, सुनीति को तो झटके पे झटके। कैसे करे? क्या करे? ये याद करना तो बड़ा मुश्किल है। हाथ पैर कांपने लगे, उसे लगा अब मैडम उनकी तरफ आएंगी लेकिन वाह री किस्मत तभी मुखर्जी मैडम को एक अटडंे र बलु ाने आया कि उन्हंे भाटिया मडै म आरै धलु े सर याद कर रहे ह।ंै अब मैडम के जाने के बाद सुनीति, शीतल और स्नेहा ने जारे-जोर से रम̂ा लगाना शुरू कर दिया, जिससे उनके दूसरे टेबलमेट्स को काफी परेशानी होने लगी, लड़कों ने तो अपना सिर पकड़ लिया। लड़कियां झिड़कने लगी- ‘कमआॅन यार डिसेन्सी भी कोई चीज होती है। वी आर आल्सो देयर हमें भी तो याद करना है, मन में याद करो।’’ खैर ये तीनों चुप हो गए। शुभदा भी दूर खड़ी धीरे-धीरे बुदबुदा रही थी। किसी तरह असमंजस में एनाटाॅमी डिसेक्शन वाला पीरियड खत्म हुआ। इसके बाद लचं के पहले धलु े सर का एम्बिय्र ाले ाजॅ ी का पीरियड था। वे बड़े सख्त थे आरै उनके नोट्स को पढ़कर ही पास होना था। थोड़ा सा भी स्टूडेंट का ध्यान भटकने पर वे चाॅक से मारते थे। उनकी पहली कक्षा जो इन्टंोडक्टंी क्लास थी सुनीति के सर के ।̊पर से गुजर गयी। मन में बड़ी निराशा थी कि अब क्या होगा- कैसे गुजरेंगे पांच साल यहां। उसके बाद जल्दी-जल्दी हाॅस्टल जा वहीं रामवती का मेस जैसे-तैसे पेट में कुछ डाल वापस फिजियोलाॅजी ओर बायोकैमिस्टंी की कक्षाएं अटेंड करनी थी। फिजियाले ाजॅ ी मंे इतना डर नहीं लगा आरै बायाके ैि मस्टीं की मडै म आरै सर दाने ांे बडे़ ही प्यारे थे। सुनीति की सहेली सिक्ता परखनली ढूंढ रही थी। सब बड़े परेशान थे कि परखनली किस चिडि़या का नाम है। वे तो केवल टेस्टट्यूब से ही वाकिफ थे। सहसा सुनीति को लगा ये टेस्टट्यूब को परखनली बोल रही है तब उसने बाॅयोकैमिस्टंी के लैब अटेनडेंट को बताया कि उसे टेस्टट्यूब चाहिए। तब जाकर कहीं सिक्ता की जान में जान आई। इस तरह दिन बीत गया और सुनीति बेचारी अपनी रूममटे के साथ वापस हास्ॅ टल मंे आ गयी। बाकी मित्रांे ने किनारा कर लिया था और कुछ अच्छे मित्रा डेस्कालर थे सो वे घर चले गए। हाॅस्टल में डरते-डरते घुस रहे थे तभी उनकी सीनियर्स ने उन्हें देख आवाज लगाई कि जल्दी ।̊पर जा हाथ मुंह धो रूम नं. 28 में पहुंच जाएं। आज तो सीनियर्स ने किसी को गधा किसी को सियार किसी को कुन्̀ाा किसी को बिल्ली किसी को शेर और किसी को मुर्गा बना दिया। किसी का मुंह पूर्व की ओर तो कोई पश्चिम की ओर मुंह किए खड़ा था। तभी एक सीनियर के दिमाग में सुनीति को देखकर नायाब आइडिया आया। उसने ठहाका लगाते हएु कहा कि- अरे तमु हो तो बदं रिया आरै कछएु का मिश्रण पर आज हमारी खश्ु ाी के लिए खरगाश्े ा बन इस कमरे मंे छलागं मारते रहा।े सनु ीति की आख्ं ाांे से तो जैसे आंसुओं की धारा बहने लगी। कल का मुर्गा आज भी पैरों में दर्द लिए था और अब वह कैसे खरगोश बन कुलांचे मार सकती थी। सुनीति उकड़ू बैठकर एक बार ही खरगोश की तरह उछली थी कि जोर से जमीन पर गिर पड़ी। कनपटी पर पलंग का कोना लग गया और खून भी बहने लगा। सुनीति चिल्ला-चिल्लाकर राने े लगी। सीनियर्स डर गए आरै हास्ॅ टल मंे सनु ीति के राने े की आवाज सनु भगदड़ मच गयी। रीमा श्रीवास्तव दीदी अपना रूम छोड़ दौड़-दौड़ कर आयी। सुनीति को तुरंत अपने साथ मेडिकल काॅलेज के हाॅस्पिटल ले जाकर कान के पीछे चार टांके लगवाकरलायी।उसकेबादवाडर्न द्वाराहास्ॅटलमंेउठलकदू वालीरैिगगं परराके लगा दी गयी।

सनु ीति तो कनपटी पर चाटे खाकर भी सबकी सहानभ्ु ाूि त न बटारे पायी। सबने साचे ा गिरने का नाटक करने की भगवान ने अच्छी सजा़ दे दी। अब धीर-े धीरे सनु ीति ने अगं जे्र ़ी, उपक्ष्े ाा आरै घण्ृ ाा इन्हंे अपना मित्रा बना लिया। जिससे दिन भी ठीक ठाक कटने लगे थे। उसे अब वीक एंड का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता था। रीमा श्रीवास्तव दीदी ने सुनीति के लिए न केवल बुक्स बल्कि बोन्स का भी इंतजाम कर दिया था। फस्र्ट एम.बी.बी.एस. में एनाटाॅमी में मानव की सारी हड्डियों का भी अध्ययन करना पडत़ ा था। सनु ीति हर शनिवार अपने बगै मंे थाडे ी़ सी हडिड् यां जरूर ले जाती थी ताकि उन्हंे घर पर पढ़ सक।े रास्ते मंे उसके साथ बस मंे बठै े सीध-े सादे राहगीर बैग से झांकती हड्डियों को बड़े आश्चर्य से देखते थे। कोई पूछता-बेबी ये सब कहां लेकर जा रही हो। सुनीति बड़े गर्व से बताती कि वो मेडिकल काॅलेज में पढ़ती है आरै ये उसकी पढ़ाई का एक हिस्सा ह।ै तरु तं लागे ांे का उसकी आरे दख्े ाने का नजरिया ही बदल जाता। कभी-कभी वो हाथ में अपना सफेद एप्रन भी पकड़े रहती थी। उसे देखकर कई बार बस में बैठे लोग अपनी जगह से उठ अपनी सीट दे देते थे ओर कहते- ‘‘डाॅ. साहिबा, आप बैठिए आप वैसे भी बहुत थकी दिख रही हैं।’’ आज कल कहां इतने अच्छे लोग मिलते हैं। एक बार तो हद ही हो गयी। एक वद्धृ महाशय बस मंे ही सनु ीति के बगै मंे हडिड् यां दख्े ा बड़े जारे -शारे से भाषण देने लगे- ‘‘लोग लड़का-लड़का करते हैं, लेकिन आज के जमाने की बेटियां किसी से कम नहीं हैं। मेरे दो बेटे लेकिन मैं और पत्नी बिल्कुल अकेले रहते हैं। इस जरा-सी लडक़ ी को दख्े ाो कसै े अकले े बस मंे खडी़ -खडी़ शिवनाथ नदी मंे अपने बजु र्गु की अस्थियां विसर्जित करने जा रही है।’’ सुनीति की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रहीथी।उसनेकहा-‘‘नहींदादाजी,आपकोगलतफहमीहोगयीह।ै मंैतोमेिडकल काॅलेज में पढ़ती हूं और ये हड्डियां तो मैं अपने साथ घर पढ़ने के लिए ले जा रही हूं।’’ लेकिन इन बुजुर्ग ने तो हार मानना सीखा ही न था। उन्होंने अपने व्याख्यान का रुख बदल कर कहना शुरू कर दिया- ‘‘देखो, लड़कियां किस तरह मां-बाप का नाम रोशन करती हैं। लड़के तो पढ़ने में बिल्कुल फिसड्डी होते हैं। ये लड़की कैसे डाॅक्टर बन रही है।’’ एक बार तो टेंन में एक गांव के किसन ने उसे डायन समझ लिया। इस तरह की मजेदार घटनाओं के साथ दिन कटने लगे। काॅलेज में सब लड़कियां सिर झुकाए चलती थी। धीरे-धीरे शीतल को सुनीति अपने स्वभाव की वजह से अच्छी लगने लगी। गार्गी के पास हडिड् यांे का अच्छा सटे था, जिसे शीतल और गार्गी मिलकर पढ़ते थे। शुभदा ने सुनीति के पास अच्छी बोन्स देखी थी। एक दिन गार्गी की हडिड् यांे को थलै ा गायब हो गया। शभ्ु ादा ने शीतल आरै गार्गी के कान भरे कि जरूर सनु ीति ने चरु ाया हागे ा। शीतल आरै गार्गी सनु ीति के कमरे मंे तलाशी लेने आई। शीतल ने जोर-जोर से चिल्लाकर कहा- ‘‘मैं तो तुम्हें अच्छी लड़की समझने लगी थी। लेकिन कुन्̀ो की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी। तुम्हें बोन्स चाहिए थी तो हमसे मांग लेती चोरी करने की क्या जरूरत थी।’’ सुनीति लाख मिन्नतें करती रही कि उसने बोन्स नहीं चुराई हैं लेकिन शीतल का पारा तो ठंडा होने का नाम ही नहीं ले रहा था। गार्गी ने सुनीति के पास की सारी बोन्स देख ली और पूरा कमरा भी चेक कर लिया कहीं कुछ न मिला। तभी उसकी रूम साफ करने वाली सुमन बाई वहां आकर बाले ती है कि- ‘‘दीदी, मंै तंै जो ढढंू ़त रहस वो तारे बिस्तर के नीचे माले ा मिलिस।’’ 1⁄4दीदी जो तुम ढूंढ़ रही थी वो तुम्हारे बिस्तर के नीचे मुझे मिला।1⁄2 उसके हाथ में हड्डियों का वही थैला था। शीतल और गार्गी को जैसे काटो तो खून नहीं। दोनों शर्म से पानी-पानी हो गयी और शुभदा पर बहुत गुस्सा आया वे खामखाह सुनीति पर तोहमत लगा रही थी।