फर्स्ट टमिर्नल परीक्षाएं हो गयी थीं आरै कॉलेज एक महीने के लिए बदं था। रिजल्ट भी ठीक-ठाक ही था, लेकिन इस बार बाबूजी अम्मा किसी से नहीं कह पा रहे थे कि सुनीति अपराजिता है। कक्षा में सर्वप्रथम आयी है क्योंकि यहां तो सभी सुनीति थे या उससे बढ़कर। इन छुट्टियों में सुनीति का मन ही घर पर नहीं लग रहा था। बार-बार गर्मी , शीतल आरै गरिमा ध्यान में आ रहे थे| एक महीने में चार बार गार्गी के घर सब हो आए थे | गार्गी के पिताजी सबके लिए दर्गु के प्िर सद्ध जलाराम हाटे ल से कचैड़ी, जलेबी, गुलाब जामुन और न जाने क्या-क्या हर बार लेकर आते थे। अब इन लोगों ने एक दूसरे को लड़कों के साथ नाम जोड़कर भी चिढ़ाना शुरू कर दिया। सभी कॉलेज खुलने का बेशब्री से इंतज़ार कर रहे थे | कॉलेज खुलते ही पहले दिन सारे हास्टलर्स डे स्कालर्स के साथ काॅलेज के  गर्ल्स काॅमन रूप में गए। वहां किसी मनचले लड़के ने बाथरूम की दीवार पर लिख रखा था-

हम से तो खुशनशीब है, इन पैखानों के पत्थर हैं। हम जिनके दीदार को तरसते हैं, उन्हें ये बेनकाब देखते हैं।

एक साथ सारी लड़कियां चिल्लाई छी-छी। सबने मिलकर उसे पानी से धोने की कोशिश भी की पर सुनीति दूर खड़ी मूंगफली  चबाती रही। दिमाग मंे यह ख्याल था कि दिल पर लिखी बातें कैसे धुलेंगी। लेकिन सब व्यर्थ गया और शायद पुताई ही उन शिलालेखों को मिटाने में सक्षम थी। अब क्लास में लड़के-लड़कियों की आपस में काफी दोस्ती हो गयी थी। लड़कों ने किस तरह उनकी रैगिंग हुई यह भी लड़ि कयांे को बताया जिसे सनु कर लड़ि कयां सकते मंे आ गयी आरै उनके रागंे टे खडे़ हो गए। एक ने बताया कि उसे रात को सीनियर्स हाॅस्टल से डिसेक्शन हाॅल में लेकर आए, जिसकी चाबी उन्होंने पहले से ही अटेंडंेट से लेकर अपने पास रखी थी। डिसेक्शन हाॅल खोलकर उसके हाथ में कुछ चने दिए और कहा कि तुम्हें चले हर टेबल पर जाकर डेड बाॅडी के मुंह में रखना है। बेचारा डरते-डरते अंदर घुस अंधेरे में हर टेबल पर रखी डेड बाॅडी के मुंह पर चने रखता है। जैसे ही आखिरी टेबल पर पहुंचा उसके चना मुंह में रखने से पहले डेडबाॅडी उठकर बैठ गयी ओर बोली- मुझे भी चना खिला दो। बेचारा तो डर के मारे बेहोश हो गया। दौड़कर सीनियर्स आए और मुंह पर पानी डाल उसे होश में लाया गया। असल वाकया यह था कि एक खाली टेबल पर एक सीनियर खुद लेट गया था। उसके बाद सीनियर्स हंसने लगे।
कुछ लड़कों ने बताया है कि उन्हें हाॅस्टल में सारे कपड़े उतार सिर पर हैट, पैर मंे जतू े माजे े आरै बदन पर कवे ल जांि घया चडड् ी पहन कर फश्ै ान परडे करनी पड़ी। कुछ लोगों को जलते हीटर पर पेशाब करने को कहा गया, जिससे उन्हें शाॅक भी लगा। बेचारे लड़कों को तो काफी मार भी पड़ी। अब लेकिन सबसे ज्यादा रैगिंग लेने वाले सीनियर्स उनके दोस्त बन गए थे और बढ़-चढ़कर उनकी पढ़ाई में मदद कररहेथ।े वही हाल लड़िकयांेका भी था जिन्हंेबाकी सीनियर्स दीदियां काफी मदद कर रही थीं। सारी क्लास एक मास बंक (एक साथ गायब) कर पिक्चर देखने भी गयी। इस तरह के कई खटट् े मीठे अनभ्ु ावांे के साथ जिदं गी आगे बढ़ने लगी। पढ़ाई का दबाव बहुत ज्यादा था लेकिन गार्गी, गरिमा, सुनीति, शीतल हाॅस्टल में आपस में हल्की-फुल्की मस्ती भी करने लगे थे। एक दिन बातों ही बातों में गरिमा ने एक मलयाली सीनियर को देख कहा कि – वाॅ, वह कितना हैंडसम है ना।’’ बस फिर क्या था गार्गी और सुनीति ने मिलकर गरिमा की जिंदगी ही बदल दी। उसके बाद रोज गार्गी और सुनीति गरिमा के कमरे के सामने अपने गा।̊न को दक्षिण भारतीय की तरह घुटने तक लपेट, कभी डांस करते-पोम̂ी पटाना है। कभी मतकुड़ी कवाड़ी हडा़ । तो कभी हम बाले गे ा तो बाले ागे ,े कभी महमदू की साउथ इंि डयन वाली एक्टिगं करते। शीतल दूर से नजारा देखती और गरिमा कुढ़ती रहती।
एक संडे जब सुनीति भिलाई गयी तो उसने मलयालम की कुछ चीजें अपने पड़ोसी से सीखी, मसलन-
मैं तुम्हें प्रेम करती हूं। -यांन निन्ने प्रेमिक्यून्नु। मैं तुम्से शादी करना चाहती हूं। -येनिके निन्ने विवाह कनिकेनम। हमारे दो बच्चे होंगे। -एनिक्य रंड कुमि̂गल उंड। चलो कहीं चले। -एविडे इंगिल पोकाम। आइए बैठिए। -वन्नालम इरिक्य। आरै तो आरै मलयालम मंे एक से दस तक की गिनती भी कठं स्थ कर ली आरै हर समय सुनीति और गार्गी पहाड़े की तरह पढ़ते रहते – ओन्ना, रंप̀, मून, नाल, अजं , आर, एड, एम̂, आम्े बर आरै पतर। अब इन्हानंे े अपनी जबान को भी मलयालम भाषियों की तरह पलटा लिया था यानि जीभ को गोल कर अंकल अब ये अगळ बोलने लगे थे। मलयालम का एक गाना भी सीख लिया था- कुआ कुआ पापा… ओ कुड़की कास के पा और सुनीति के हाथ कहीं से उस सीनियर संजीव की कापी लग गयी। फिर था उस पर टंेन पेपर रख उसने उसकी ही लिखाई की तरह लिखने की प्रैक्टिस शुरू कर दी। संजीव रायपुर में ही जवाहर नगर में रहता था। गरिमा के जन्मदिन के एक दिन पहले गार्गी और सुनीति रिक्शा लेकर जवाहर नगर पहुंची और वहीं के लेटर बाॅक्स से लगभग संजीव की लिखावट में ग्रीटिंग कार्ड डाला जो ठीक जन्मदिन के दिन गरिमा को मिला। बेचारी तो आज तक सोचती होगी कि वो कार्ड वाकई संजीव ने ही भेजा था।
बस फिर क्या था गरिमा को बकरा बनाकर पूरा उसका जन्मदिन उसके और संजीव के भविष्य के सपनों की खिल्ली उड़ाने में बीत गया। बेचारी गरिमा कभी अपनी सहेि लयांे को दख्े ाती, कभी सजीव की लिखावट, तो कभी जवाहर नगर के स्टपंै को। बाप रे बाप, वो मलयाली मैं कायस्थ, पापा तो बस काट कर ही रख देंगे ये गरिमा के दिल की आवाज थी। वहीं सुनीति और गार्गी तो बस- ‘‘कुछ नहीं होता अब तो अवियल आरै अप्पम 1⁄4करे ल के प्िर सद्ध खाने की चीज1⁄2ंे खाने की आदत डाल ल,े प्यार अध्ं ाा हाते ा ह,ै अकं ल आटं ी को भी तरे े प्यार के आगे झकु ना पडगे़ ा।’’ शीतल उन्हें बार-बार डांट कर आगाह करती कि- मजाक की भी कोई हद होती है, प्लीज उस लिमिट को क्राॅस मत करो।’’ लेकिन सुनीति और गार्गी तो गरिमा और संजीव बच्चों के नाम सोचने में व्यस्त रहते थे। इधर सुनीति को भी ये लोग एक सीनियर सलीम सिकोरा के नाम से चिढ़ाने लगे। लेकिन न तो उसकी कापी गार्गी के हाथ आ सकती थी और नही वो ग्रीटिंग कार्ड भेज सकती थी। बस रमजान के महीने में गार्गी, शीतल, गरिमा सुबह-सुबह प्लान बना कर उसके कमरे में ठक-ठक कर से कहते- ‘‘सुनीति बेगम, सायरन बज गया है जल्दी-जल्दी सहरी कर लो अब तो तुम्हारे रोजे का समय शुरू हो रहा है।’’ गार्गी फिर कहती- ‘‘अरे, इसका नाम सायराबानो या आयशा सुल्तान रख देते हैं।’’ शाम को फिर सायरन बजने पर सुनीति को इफ्तारी की याद दिलाई जाती। इस तरह की नोंक-झोंक मस्ती के साथ सुनीति के दिन अब बड़ी मस्ती में गुजर रहे थे।
सुनीति अंग्रेज़ी में अभी भी कच्ची ही थी। एक दिन अपने कमरे के बाहर बठै कर जारे -जारे से मथ्ै ाडस् आफॅ क्राटं ां सप्े शन 1⁄4परिवार नियाजे न के तरीक1⁄2े पढ़ रही थी। एक सीनियर ने उसे बुलाकर जोर से डांटा- गधी लड़की कुछ पता है क्या पढ़ रही है? इन सारी सीक्रेट रखी जाने वाली चीजों को कम से कम। लड़कियां तो मन ही मन में याद करती हैं।’’ सुनीति का मुंह फूल गया। लो ये क्या बात हुई पढ़ाई की चीजों में कुछ सीक्रेट भी होता है। कहां तो डाॅक्टर बनने वाली बात और कहां ये दकियानसू ी। फिर भी एक अल्हड़ पागल लड़की अपने सीनियर्स के दिल मंे जगह बनाती जा रही थी।